upelection2022 बहुजन समाज पार्टी

upelection2022: बहुजन समाज पार्टी: Ashok Das की कलम से: सवाल यह है कि बसपा क्यों हार गई।

इससे भी बड़ा सवाल यह है कि बसपा इतनी बुरी तरह से क्यों हार गई।

अभी तक के रुझान और नतीजे बता रहे हैं कि बसपा पार्टियों में सबसे नीचे खड़ी है। ओमप्रकाश राजभर की पार्टी, अनुप्रिया पटेल की पार्टी, कांग्रेस पार्टी, जयंत चौधरी की लोकदल पार्टी और यहां तक की निषाद पार्टी तक बहुजन समाज पार्टी से आगे हैं। जब मैं यह खबर आपसे साझा कर रहा हूं, बसपा सिर्फ एक सीट पर आगे दिख रही है। और इसके कभी भी शून्य यानी जीरो हो जाने का खतरा बना हुआ है। upelection2022: बहुजन समाज पार्टी

2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा पहले ही शून्य पर पहुंचने का रिकार्ड बना चुकी है। वो रिकार्ड विधानसभा चुनाव में न बनें तो बेहतर।

लेकिन बसपा के हार की वजह क्या है? क्या सिर्फ बहनजी?

जी नहीं। बसपा के हार की वजह इस पार्टी के नेता हैं जो इतने रीढ़ विहीन हैं कि पार्टी से निकाले जाने के डर से अपनी आवाज को गिरवी रख चुके हैं। बसपा के हार की वजह उसके समर्थक भी हैं, जो पार्टी की कमियों पर बात नहीं करना चाहते, जो अपनी नेता की कमियों पर बात नहीं करना चाहते। यही नहीं, कमियों को सुनना भी नहीं चाहते। बल्कि जो लोग उन कमियों को सामने लाते हैं, उस पर बात करते हैं, उनको गालियां तक देने को तैयार रहते हैं। छूटते ही उन्हें किसी दूसरे दल का एजेंट, दलाल या बिका हुआ बता दिया जाता है। दूसरे मीडिया हाउस को मनुवादी और गोदी मीडिया बताने वाले यही लोग अपने समाज के लेखकों और पत्रकारों से जमीनी हकीकत सुनने की बजाय सिर्फ बसपा की जय-जय सुनने की उम्मीद करते हैं।

और शायद बसपा का शीर्ष नेतृत्व भी यही चाहता है। वह नहीं चाहता कि उससे सवाल पूछे जाएं। वह सवाल पूछने और उठाने वालों को बेइज्जत कर बाहर का रास्ता दिखा देता है। और उसके ज्यादातर समर्थक बिना सच्चाई जाने आवाज उठाने वालों की फजीहत करने पर उतारु हो जाते हैं। कुल मिलाकर बसपा का शीर्ष नेतृत्व पार्टी के साथ ही अपने समर्थकों का भी हुक्मरान बना बैठा है। upelection2022: बहुजन समाज पार्टी 

उत्तर प्रदेश चुनाव के नतीजे बसपा की राजनैतिक हार भर नहीं है। यह एक बड़े समाज का सपना टूट कर चकनाचूर हो जाने जैसा है। वह एक बड़े विजनरी मसीहा मान्यवर कांशीराम के संघर्ष के खत्म हो जाने जैसा है। वह दलितों के उस हुजूम के साथ धोखा है, जो हर हार के बाद भी रैलियों में इस उम्मीद के साथ उमड़ती है, कि शायद इस बार कुछ बेहतर होगा। वह समाज के आखिरी छोड़ पर खड़े उस व्यक्ति के साथ बड़ा छल है, जिसने अपनी झोपड़ी पर इस उम्मीद में नीला झंडा टांग रखा है, कि एक दिन हुकुमत के शीर्ष पर उसके समाज का नेता बैठेगा, जो उसे उसका हक दिलाएगा।

लेकिन ईमानदारी से देखें तो बसपा का चुनाव पिछले कुछ सालों से हार और जीत से इतर कहीं न कहीं समझौते और राजनीतिक दबाव का चुनाव दिखने लगा है। वह पार्टी की बजाय एक व्यक्ति का अपना अकेले का चुनाव दिखने लगा है। ऐसी नेत्री का चुनाव जिसने अपने जीवन में बहुत कुछ कुर्बान कर बहुजन समाज की नेत्री से बढ़कर देवी तक का खिताब हासिल किया, लेकिन जो अब हठी और आत्म केंद्रित हो गई हैं। इतनी आत्म केंद्रित कि बहुजन नायकों का सपना उनके अपने एजेंडे पर भारी हो चुका है।